रविवार 19 अप्रैल 2026 - 11:54
शहीद-ए-उम्मत — आयतुल्लाहिल उज़मा सय्यद अली ख़ामेनेई और हिंदुस्तान

 शहीद आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने हमेशा इस बात पर ध्यान दिलाया कि मतभेदों को हवा देना किसी भी समाज के लिए हानिकारक होता है, और यह कि जो ताकतें समाजों को कमज़ोर करना चाहती हैं, वे सबसे पहले उनके अंदर विभाजन पैदा करती हैं। इसके विपरीत, उन्होंने एकता, संवाद और आपसी सम्मान को ही सफलता का मार्ग बताया।

लेखक: मौलाना सय्यद करामत हुसैन शऊर जाफ़री

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी — दुनिया के नक़्शे पर कुछ ऐसे क्षेत्र होते हैं जो महज़ भूगोल नहीं होते, बल्कि सभ्यता, विचार और आध्यात्मिकता के अमीन होते हैं, और भारत उन्हीं धरतीयों में से एक है, जिसे सदियों से ज्ञान, इरफ़ान, तसव्वुफ़ और सभ्यतागत सद्भाव का गहवारा समझा जाता है। शहीद रहबर की नज़र में भी भारत केवल एक देश नहीं था, बल्कि एक ऐसी सभ्यतागत ताकत था, जिसके अंदर जागरूकता, वहदत और विचारगत ऊर्जा के बेशुमार अवसर छिपे हुए थे। यही कारण था कि उनके भाषणों और वक्तव्यों में भारत और उसकी जनता का ज़िक्र महज़ रस्मी नहीं, बल्कि गहरी नज़र और खैरख्वाही के साथ मिलता है।

वे भारत को केवल एक भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं देखते थे, बल्कि एक सभ्यतागत प्रयोग समझते थे—एक ऐसा प्रयोग, जिसमें विभिन्न राष्ट्र और धर्म एक साथ रहकर एक साझा समाज का निर्माण करते हैं। उनके एक पैग़ाम में ये शब्द मिलते हैं:

"भारत एक प्राचीन और महान सभ्यता का धारक देश है, जहाँ विभिन्न विश्वासों के लोग सदियों से एक-दूसरे के साथ जीवन बिता रहे हैं। यह विशेषता इसे दुनिया के लिए एक ध्यान देने योग्य उदाहरण बनाती है।"
(स्रोत: पैग़ाम बे अवाम-ए-हिंद, 2014)

यह वाक्य वास्तव में इस हक़ीक़त की ओर इशारा था कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता नहीं, बल्कि इस विविधता को संभालने की क्षमता है।

शहीद रहबर हमेशा इस बात पर ज़ोर देते थे कि किसी भी समाज की तरक्की सिर्फ़ आर्थिक या वैज्ञानिक क्षेत्र में नहीं होती, बल्कि उसकी असली तरक्की उसके नैतिक और मानवीय रवैयों में होती है। वे भारत के संबंध में यही उम्मीद रखते थे कि यहाँ के लोग अपनी साझा मानवीय क़ीमतों—इंसाफ़, सम्मान, सहिष्णुता और आपसी सहयोग—को मज़बूत करें, क्योंकि यही वे बुनियादें हैं जो किसी भी राष्ट्र को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करती हैं। उनके एक भाषण में ये शब्द मिलते हैं:

"किसी भी समाज की ताकत उसके हथियारों या संसाधनों में नहीं, बल्कि उसके लोगों के बीच विश्वास और आपसी सम्मान में होती है।"
(स्रोत: बयानात-ए-रहबर, अंतर्राष्ट्रीय भाषण, 2016)

इसी विस्तृत परिप्रेक्ष्य में वे भारतीय मुसलमानों को भी एक सकारात्मक और रचनात्मक ताकत के रूप में देखते थे—एक ऐसी ताकत जो अपने ऐतिहासिक, वैज्ञानिक और सभ्यतागत संसाधनों के साथ इस देश की समग्र प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। उनके नज़दीक भारतीय मुसलमान अपनी पहचान के साथ-साथ अपने वतन की तरक्की के ज़िम्मेदार नागरिक भी हैं, और ये दोनों पहलू एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे को ताक़त देते हैं। उनके एक बयान में ये शब्द मिलते हैं:

"भारत के मुसलमान अपने देश के सक्रिय और ज़िम्मेदार नागरिक हैं, वे अपने ज्ञान, अपनी मेहनत और अपने चरित्र के माध्यम से समाज में सकारात्मक भूमिका अदा कर सकते हैं और करना चाहिए।"
(स्रोत: दीदार बा तलाब-ए-हिंदी, क़ुम, 2010)

यह पैग़ाम किसी अलगाव या फासले का नहीं, बल्कि समावेश और निर्माण का था—कि एक व्यक्ति अपनी धार्मिक और सभ्यतागत पहचान के साथ अपने देश की प्रगति में शामिल हो सकता है और होना चाहिए।

शहीद रहबर भारत के राजनैतिक और सामाजिक परिदृश्य में मुसलमानों की भूमिका को इस दृष्टिकोण से देखते थे कि वे अद्ल, सहिष्णुता और सामाजिक सद्भाव के दाई बनें, वे अपने अख़्लाक़, शिक्षा और सकारात्मक तौर-तरीके के माध्यम से समाज में विश्वास को मज़बूत करें, क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली ताकत यही होती है कि उसके विभिन्न वर्ग एक-दूसरे पर विश्वास करें और मिलकर आगे बढ़ें। उनके एक पैग़ाम में ये शब्द मिलते हैं:

"हर वह व्यक्ति जो अपने समाज में इंसाफ़, ईमानदारी और सेवा को बढ़ावा देता है, वह वास्तव में अपने देश को मज़बूत बना रहा होता है।"
(स्रोत: पैग़ाम आलमी, 2017)

यह सोच वास्तव में भारत जैसे बहुसांस्कृतिक समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जहाँ हर वर्ग यदि अपनी ज़िम्मेदारी को सकारात्मक ढंग से निभाए, तो समग्र व्यवस्था स्थिर हो जाती है।

भारत के नौजवानों के बारे में उनकी उम्मीदें विशेष रूप से उल्लेखनीय थीं। वे नौजवानों को सिर्फ़ भविष्य की संपत्ति नहीं, बल्कि वर्तमान की सबसे बड़ी ताकत समझते थे। उनके नज़दीक नौजवान वह वर्ग है जो पुरानी दीवारों को गिराकर नए रास्ते बना सकता है, बशर्ते वह ज्ञान, चेतना और ज़िम्मेदारी के साथ आगे बढ़े। उनके एक पैग़ाम में ये शब्द मिलते हैं:

"मैं भारत के नौजवानों से कहता हूँ कि वे अपने देश की असली ताकत को पहचानें, ज्ञान हासिल करें, इंसाफ़ का साथ दें और अपने समाज को बेहतर बनाने में अपनी भूमिका अदा करें।"
(स्रोत: पैग़ाम बे जवानान-ए-हिंद, 2015)

यह दावत वास्तव में एक सर्वव्यापी संदेश था—कि बदलाव किसी एक समूह से नहीं, बल्कि पूरे समाज के जागृत होने से आता है, और इसमें हर वर्ग, हर समुदाय और हर व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

शहीद रहबर ने हमेशा इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि मतभेदों को हवा देना किसी भी समाज के लिए हानिकारक होता है, और यह कि जो ताकतें समाजों को कमज़ोर करना चाहती हैं, वे सबसे पहले उनके अंदर विभाजन पैदा करती हैं। इसके विपरीत, उन्होंने एकता, संवाद और आपसी सम्मान को ही सफलता का मार्ग बताया। उनके एक बयान में ये शब्द मिलते हैं:

"जब लोग एक-दूसरे को समझने के बजाय एक-दूसरे से दूर होने लगते हैं, तो समाज कमज़ोर हो जाता है, और जब वे एक-दूसरे को स्वीकार कर लेते हैं, तो वही समाज मज़बूत हो जाता है।"
(स्रोत: बयानात-ए-रहबर, आलमी भाषण, 2017)

इस प्रकार उनकी नज़र में भारत एक उम्मीद, एक संभावना और एक साझा ज़िम्मेदारी था—एक ऐसा देश जहाँ हर व्यक्ति, चाहे वह किसी भी धर्म या वर्ग से संबंध रखता हो, यदि अपने कर्तव्य, ईमानदारी और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़े, तो एक ऐसा समाज निर्मित हो सकता है जो न केवल अपने लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन जाए।

दुआ:

ऐ खुदा! शहीद रहबर की खिदमात, उनके सब्र और उनके विचारों को अपनी बारगाह में क़बूलियत अता फरमा, उनके दर्जात को बुलंद से बुलंदतर फरमा, उनकी कुर्बानियों को इस उम्मत की बेदारी का ज़रिया बना, और उनके छोड़े हुए रास्ते को हमेशा ज़िंदा और ताबिंदा रख।

ऐ परवरदिगार! इस्लामी गणतंत्र ईरान को अपनी खास हिफाज़त में रख, उसे हर तरह के फितनों, साजिशों और दुश्मनी से महफूज़ फरमा, इस सरज़मीन को ज्ञान, न्याय और इज़्ज़त का केंद्र बना, और इसे मज़लूमों के लिए उम्मीद और हक़ के लिए सब्र व संघर्ष का निशान बनाए रख।

ऐ रब्ब-ए-करीम! वर्तमान रहबर-ए-इंक़िलाब को सेहत, लंबी उम्र, इरादे की मज़बूती और नूर-ए-बसीरत अता फरमा, उन्हें हर मुकाम पर अपनी नुसरत और ताइयद से सरफ़राज़ फरमा, और उनके माध्यम से उम्मत-ए-मुस्लिमा और पूरी मानवता को अमन, इंसाफ़ और बेदारी का रास्ता दिखाता रह।

ऐ खुदा! हमारे वतन भारत और इसके सभी निवासियों को अमन, मुहब्बत और आपसी सम्मान अता फरमा, उनके दिलों में एकता और खैरख्वाही पैदा फरमा, और उन्हें इस काबिल बना कि वे अपनी सभ्यता, अपनी मानवता और अपनी साझा क़ीमतों के साथ दुनिया के लिए एक रौशन उदाहरण बन सकें।

ऐ परवरदिगार! हम सब को शहीदों के रास्ते पर चलने की तौफीक़ अता फरमा, हमें इख़्लास, बसीरत और सब्र व संघर्ष से नवाज़, और हमें उन लोगों में शामिल फरमा जो हक़ के लिए जीते हैं और हक़ ही के लिए दुनिया से रुख़सत होते हैं।

"रब्बना तक़ब्बल मिन्ना इन्नका अंतस समीउल अलीम" (बक़रा: 127)

अर्थ: हमारे रब! हमसे (यह कर्म) क़बूल फरमा, बेशक तू ही सब कुछ सुनने-जानने वाला है।

और हमारी अंतिम प्रार्थना यह है कि सब प्रशंसा अल्लाह के लिए है जो सारे संसार का पालनहार है।

टैग्स

आपकी टिप्पणी

You are replying to: .
captcha